Indira Priyadarshini  इन्दिरा प्रियदर्शिनी

Indira Priyadarshini इन्दिरा प्रियदर्शिनी

by Ramanuj Tiwari रामानुज तिवारी

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  • ISBN13: 9789350002386
  • Binding: Hardcover
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Pages: 120
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd
  • Item Weight: 350GM
  • BISAC Subject(s): Literature & Fiction
"किसी भी देश का प्रधानमन्त्री राष्ट्र की आत्मा होता है। उसकी हर धड़कन में राष्ट्र के प्राण बसते हैं। उसके खुश रहने पर राष्ट्र हँसता है, दुखित होने पर राष्ट्र रोता है। वैयक्तिक, धार्मिक अथवा किसी अन्य स्वार्थ से प्रेरित होकर उसकी जान से खिलवाड़ करना राष्ट्रीय आत्मा के साथ द्रोह करना है। वैसे देश-द्रोहियों को जनता कभी माफ नहीं करती। जनमत एक दिन अवश्य अपने न्यायालय में उन्हें उपस्थित कर कठोर दण्ड की व्यवस्था करेगा ताकि फिर से कोई षड्यन्त्र करने का दुस्साहस न करे । इन्दिरा जी ने भारत को सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक स्तर पर जितना ऊँचा उठाया, उतना अथक परिश्रम के बाद ही पूरा किया जा सकता है। भारत की जनता यह कभी नहीं भूलेगी कि उसके चतुर्दिक उत्थान के लिए समर्पित एक नारी का कारुणिक अन्त कर दिया गया, जब राष्ट्र घोर संकट से गुजर रहा था ।
इन्दिरा जी का नाम भारतीय प्रधानमन्त्री के लिए रूढ़-सा हो गया था। देश-विदेश की राजनीति में पन्द्रह वर्षों तक छायी रहने वाली उस तेजस्वी महिला की मौत से जो अपूरणीय रिक्तता हुई, उससे जनसमूह एकबारगी आतंकित हो उठा। जीवनपर्यन्त उनका विरोध करने वाले भी भयकंपित रहे- अब भारत का क्या होगा? भारत की एकता, अखण्डता, मानव-प्रेम और बाहरी खतरों के लिए वह हमेशा आगाह करती रही थीं। पर राजनैतिक
स्टंट और यूटोपिया कह कर लोग टालते रहे। उस दिन उसी एकता, अखंडता और खतरे की आशंका से हम बिफर उठे। ऐसा लगने लगा, जैसे सचमुच भारत अनाथ हो गया हो । मरते वक्त भी उन्होंने हाथ जोड़ने की भावप्रवण मुदा में जैसे यही कारुणिक सन्देश दिया था।"

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