1974 : Vyavastha Parivartan Ka Andolan Aur JP Ka Sapna 1974 : व्यवस्था-परिवर्तन का आन्दोलन और जेपी का सपना
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- Binding: Hardcover
- Publisher: Vani Prakashan
- Pages: 204
- Language: Hindi
- Edition: 1st
- Item Weight: 350GM
- BISAC Subject(s): Sahitya
‘सन् 1974 आज़ाद भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण वर्ष है। इस साल अभावों से ग्रस्त, भ्रष्टाचार से त्रस्त, हिंसक मार्ग पर बढ़ते और लगातार केन्द्रीकृत होते लोकतन्त्र को सम्पन्नता, समता, अहिंसा और विकेन्द्रीकरण की ओर ले जाने के लिए देश का युवा मचल उठा था। नवनिर्माण की ऊर्जा से बेचैन युवाओं ने गुजरात से बिहार तक एक नयी क्रान्तिकारी लोकतान्त्रिक चेतना जगा दी थी। उस चेतना को गढ़ने और राह दिखाने का काम किया प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, समाजवादी और सर्वोदयी पुरोधा जयप्रकाश नारायण ने। इकहत्तर साल के जेपी ने इस युवा आन्दोलन को ‘सम्पूर्ण क्रान्ति' जैसा सैद्धान्तिक आदर्श प्रदान किया। यह आन्दोलन जब सड़कों पर उतरा तो प्रदेश से लेकर केन्द्र तक की कांग्रेस सरकारों से जा टकराया। इसकी परिणति देश में आपातकाल तक गयी। इक्कीस महीने बाद लोकतन्त्र की बहाली हुई, नयी सरकार बनी लेकिन लोकतन्त्र को विस्तार देने और व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने का जेपी और छात्र युवाओं का सपना धरा रह गया।
आज पचास साल बाद उस आन्दोलन, उससे निकले संगठन और उसके कामों का सिंहावलोकन आवश्यक हो गया है, क्योंकि लोकतन्त्र भारत समेत पूरी दुनिया में संकट में है। उदारीकरण और धर्म का मुखौटा लगाकर पूँजीवाद कट्टर हो चुका है। उसे अब लोकतन्त्र की ज़रूरत नहीं है। चुनाव के माध्यम से अधिनायकवादी नेतृत्व उभर रहे हैं, लोकतान्त्रिक संस्थाएँ अब कॉरपोरेट संचालित पार्टियों के द्वारा, पार्टियों के लिए और पार्टियों की संस्थाएँ होकर रह गयी हैं। कल्याणकारी राज्य झूठ का आख्यान रचने वाला एक हिंसक उपकरण बनकर रह गया है। कॉरपोरेट बहुसंख्यकवाद धर्म का चोला पहनकर लोकतन्त्र से ख़तरनाक खेल खेल रहा है। लेकिन यह बिगाड़ सरकारों के स्तर तक ही नहीं है। समाज से स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व के लोकतान्त्रिक मूल्य ही ओझल हो गये हैं।’
आज पचास साल बाद उस आन्दोलन, उससे निकले संगठन और उसके कामों का सिंहावलोकन आवश्यक हो गया है, क्योंकि लोकतन्त्र भारत समेत पूरी दुनिया में संकट में है। उदारीकरण और धर्म का मुखौटा लगाकर पूँजीवाद कट्टर हो चुका है। उसे अब लोकतन्त्र की ज़रूरत नहीं है। चुनाव के माध्यम से अधिनायकवादी नेतृत्व उभर रहे हैं, लोकतान्त्रिक संस्थाएँ अब कॉरपोरेट संचालित पार्टियों के द्वारा, पार्टियों के लिए और पार्टियों की संस्थाएँ होकर रह गयी हैं। कल्याणकारी राज्य झूठ का आख्यान रचने वाला एक हिंसक उपकरण बनकर रह गया है। कॉरपोरेट बहुसंख्यकवाद धर्म का चोला पहनकर लोकतन्त्र से ख़तरनाक खेल खेल रहा है। लेकिन यह बिगाड़ सरकारों के स्तर तक ही नहीं है। समाज से स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व के लोकतान्त्रिक मूल्य ही ओझल हो गये हैं।’
अंबरीश कुमार : जयप्रकाश आन्दोलन से जुड़ाव और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पदाधिकारी के तौर पर छात्र राजनीति में हिस्सेदारी। पत्रकारिता की शुरुआत बेंगलरु से। 1988 में एक्सप्रेस समूह के अख़बार 'जनसत्ता' से जुड़ाव। छत्तीसगढ़ में ‘इंडियन एक्सप्रेस' के ब्यूरो प्रमुख रहे। लखनऊ में ‘जनसत्ता' का संस्करण शुरू किया। तीन पुस्तकों का प्रकाशन- लालू प्रसाद यादव (मोनोग्राफ़); घाट-घाट का पानी और डाकबँगला (यात्रा-संस्मरण)। 'शुक्रवार' पत्रिका का सम्पादन। यूट्यूब चैनल 'सत्य हिन्दी' पर 'जनादेश' कार्यक्रम का संचालन।
अरुण कुमार त्रिपाठी : पत्रकार, लेखक और शिक्षक। 'जनसत्ता', ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘हिन्दुस्तान' अख़बार में ढाई दशक तक पत्रकारिता। 216 से विश्वविद्यालय अध्यापन। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा; माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल और डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्रोफ़ेसर एडजंक्ट और एकेडमिक फ़ेलो रहे।
सम्प्रति : आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर के गांधियन स्कूल फ़ॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल इक्विटी में प्रोफ़ेसर। दर्जन भर से अधिक पुस्तकों का लेखन और सम्पादन। ‘आज के प्रश्न' शृंखला के सम्पादक।
अरुण कुमार त्रिपाठी : पत्रकार, लेखक और शिक्षक। 'जनसत्ता', ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘हिन्दुस्तान' अख़बार में ढाई दशक तक पत्रकारिता। 216 से विश्वविद्यालय अध्यापन। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा; माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल और डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्रोफ़ेसर एडजंक्ट और एकेडमिक फ़ेलो रहे।
सम्प्रति : आईटीएम विश्वविद्यालय, ग्वालियर के गांधियन स्कूल फ़ॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल इक्विटी में प्रोफ़ेसर। दर्जन भर से अधिक पुस्तकों का लेखन और सम्पादन। ‘आज के प्रश्न' शृंखला के सम्पादक।